रक़्त का थक्का(स्कंदन) बनने की क्रियाविधि।थक्का बनना क्यों ज़रूरी है

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रक़्त का स्कंदन या ब्लड क्लोटिंग (Blood Clotting) होना क्यों ज़रूरी होता है, और यह प्रक्रिया कैसे पूरी होती है?

रक़्त परिसंचरण तंत्र में यह तीसरा पोस्ट उसी को आगे बढ़ाते हुए है, रक़्त का थक्का कैसे बनता है। जिसमें हम लोग कुछ सवालों को देखेंगे।

चोट लगने पर ख़ून का थक्का किस तरह से बनता है?

इसमें कौन-कौन से रसायन पदार्थ भाग लेते हैं?

हमारी नसों में ख़ून का थक्का क्यों नहीं बनता?

कौनसी ऐसी बीमारियां हैं, जिनमें रक़्त का थक्का नहीं बनता है।

जब भी हमें छोटी-सी भी चोट लगती है, तो कुछ ही समय के बाद रक़्त का थक्का बन जाता है और ख़ून का बहना रुक जाता है।

अगर यह प्रक्रिया ना हो तो ख़ून लगातार बहता रहेगा, जो आगे चलकर बहुत ज़्यादा घातक साबित हो सकता है। इसलिए हमारा शरीर, चोट वाले भाग (Injured Part) पर तुरंत रक़्त को थक्का (स्कंदित) बनाने की प्रक्रिया शुरु कर देता है।

process of blood coagulation

रक़्त का थक्का (Blood Clotting) या सामान्य बोलचाल में ख़ून का जमना, एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है (Cascade or Chain of Biochemical Reactions) और यह बहुत सारे प्रोटीन, एंज़ाइम और कुछ आयनों की उपस्थिति में पूरी होती है।

इन सभी प्रोटीन, एंज़ाइम और आयनों को 12 क्लोटिंग फैक्टरों (12 Factors which are comprises of Proteins, Enzymes & Ions) में विभाजित किया गया है।

जैसा कि पहले भी लिखा गया है,रक़्त के थक्का बनने की क्रियाविधि एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है। 

जो चोट लगने पर या शरीर की त्वचा (small cut on the skin) के किसी भाग के कटने पर शुरू होती है, और रासायनिक अभिक्रियाओ की एक शृंखला (Cascade of Reactions) बनती जाती है।

और तब तक चलती रहती है जब तक कि रक्त का स्कंदन (Blood Clotting) नहीं हो जाता है। 

इस पूरी प्रक्रिया में ऐसे रसायनिक पदार्थ बनते हैं, जो आगे चलकर रक़्त का थक्का बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रक़्त का थक्का (स्कंदन) बनने में लगने वाला समय, घाव की गहराई पर भी निर्भर करता है। 

हालांकि सामान्य अवस्था में रक़्त के थक्का बनने में लगने वाला समय कम से कम 2 मिनट और अधिक से अधिक 8 मिनट हो सकता है।

लेकिन जेनेटिक या अनुवांशिक बीमारियों (Genetic Diseases) में यह प्रक्रिया सही प्रकार से नहीं होती जैसे कि- हीमोफीलिया (Hemophilia is a blood related genetic Disorder) के ही केस में होता है,जहां पर क्लोटिंग फैक्टर VIII और क्लोटिंग फैक्टर IX, जीन उत्परिवर्तन (Due defect in gene mutation)के कारण नहीं बनते है।

इसलिए ऐसे व्यक्ति जिनको ये बीमारी है उन्हें चोट लगने पर तुरंत बहार से क्लॉटिंग फैक्टर चढ़ाना पड़ता है।

कैसे रक़्त का थक्का बनने की प्रक्रिया शुरू होती है?

जब भी हमें कोई चोट लगती है और ख़ून का बहना शुरू (oozing of Blood start) होता है, तो हमारे रक़्त में मौजूद ब्लड प्लेटलेट्स (Blood Platelets), क्लोटिंग फैक्टर (Clotting Factors) को बनाना शुरु कर देती हैं।

हमारे शरीर में अधिकतर क्लोटिंग फैक्टर्स लीवर (most of the Clotting Factors are synthesized in Liver) में ही बनते हैं।

इसी प्रकार से जो हमारा चोटिल टिशु या उत्तक (Injured tissue or part of cut) होता है,वह भी क्लोटिंग फैक्टर3 प्रोटीन या प्रोथ्रोम्बिन प्रोटीन का निर्माण शुरू कर देता है। 

यह दोनों मिलकर एक एंज़ाइम प्रोथ्रोम्बिनेस का निर्माण करते हैं।

प्रोथ्रोम्बिनेस एंज़ाइम एक दूसरे निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन प्रोटीन को सक्रिय थ्रोम्बिन प्रोटीन में बदल देता है। उपरोक्त प्रक्रिया में कैल्शियम आयन की ज़रूरत होती है। 

इसके अलावा प्रोथ्रोम्बिनेस, हिपैरिन को भी निष्क्रिय करता है। हिपैरिन एक एंटीकोगुलेंट है, (Heparin is anticoagulant) जोकि नसों के अंदर रक़्त के थक्का बनने को रोकता है। 

इसी की वजह से हमारे शरीर की नसों में ख़ून नहीं (prevent blood clotting in blood vessels) जमता है और तरल अवस्था (flow in gel state) में बहता रहता है।

अगर हिपैरिन एक्टिव रहता है तो रक़्त का थक्का बनने में दिक्कत आती है, इसलिए हिपैरिन को रक़्त का थक्का बनने तक (inactive) निष्क्रिय रखा जाता है।

अब सक्रिय थ्रोम्बिन प्रोटीन रक़्त में मौजूद एक घुलनशील फाइब्रिनोजेन प्रोटीन को अघुलनशील फाइब्रिन में बदल देता है। यह फाइब्रिन घाव वाली जगह पर जाल की तरह से रचना बना लेते हैं।

जहां पर रक़्त कोशिकाएं आकर रूकती है, और कुछ ही समय में रक़्त का थक्का बन जाता है।

थक्का बनने के बाद एक तरल निकलता है, जिसे हम सीरम (Serum) कहते हैं। असल में सीरम रक़्त का वह भाग है जिसके अंदर फाइब्रिनोजेन-प्रोटीन (Fibrinogen clotting factor is absent)अनुपस्थित होता है।

क्लोटिंग फैक्टर कौन-कौन से हैं?

कुल मिलाकर 12 प्लॉटिंग क्लोटिंग फैक्टर हैं जोकि रक्त का थक्का बनाने में मदद करते हैं यह क्लोटिंग फैक्टर प्रोटीन, एंजाइम और आयन है।

आप एक-एक करके, इसके बारे में नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं ।

Clotting Factors

इन क्लोटिंग फैक्टर को रोमन संख्या द्वारा लिखा जाता है, यहां पर यह ध्यान देने वाली बात है कि क्लोटिंग फैक्टर-VI (Clotting Factor-VI is a hypothetical Factor) हाइपोथेटिकल फैक्टर है, असल में यह उपस्थित ही नहीं होता है।

अंत में(Conclusion)-

उपरोक्त पोस्ट में हमने समझा कि, रक़्त थक्का बनने की क्रियाविधि, किस प्रकार से शरीर में चलती है और क्यों ज़रूरी है।

इसके सही प्रकार से न होने पर कितनी ज़्यादा दिक्कत आ सकती है।  

आशा है यह पोस्ट आपको अच्छा लगा होगा, हमने अपनी तरफ ब्लड क्लोटिंग (Blood Clotting) पर लगभग पूरी जानकारी साझा करने का प्रयास किया है।

लेकिन फिर भी अगर कोई कमी या सुझाव आपको लगता है, तो उसे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। आपके किसी भी सुझाव को हम अपनी वेबसाइट में साझा करने का प्रयास करेंगे। 

अपना क़ीमती समय देने के लिए आपका बहुत धन्यवाद।। Thanks!!

उम्मीद है आपकी इंटरनेट यात्रा शुभ होगी!!

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