Colour Blindness (वर्णांधता) in Hindi।इसके प्रकार, टेस्ट और इलाज

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वर्णांधता या कलर ब्लाइंडनेस (Colour Blindness)

क्या वर्णांधता अनुवांशिक बीमारी है?

वर्णांधता अगर माता-पिता में से किसी एक को है, तो आने वाली संतान में भी होने की संभावना है?

वर्णांधता के जीन किस क्रोमोसोम पर होते हैं?

वर्णांधता कितने प्रकार की हो सकती हैं?

इन सारे सवालों के जवाब और भी बहुत कुछ हम इस ब्लॉग से समझने का प्रयास करेंगे।

क्या है वर्णांधता (what is Colour blindness)?

वर्णांधता सेक्स लिंग अप्रभावी अनुवांशिक(sex linked recessive genetic disease) बीमारी है। इसे डाल्टन डिज़ीज़ (Dalton disease) के नाम से भी जाना जाता है।

सबसे सामान्य तौर पर पाई जाने वाली वर्णांधता में लाल और हरे रंग को समझने में दिक्कत आती है। 

इस रोग से पीड़ित व्यक्ति, लाल और हरे रंगों के बीच विभेद नहीं कर सकता इसलिए इसे लाल और हरी वर्णांधता या रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस (also popularly known by Red-Green colour blindness)  भी नाम दिया जाता है।

अतः यह माता-पिता से उनकी संतानों में पहुंचती है और संतान में जन्म के समय से ही यह बीमारी उपस्थित होती है।

colour blindness in hindi

वर्णांधता के जीन कहां होते हैं(on which chromosome colour blindness gene is present)?

वर्णांधता के लिए उत्तरदाई डिफेक्टिव जीन एक्स क्रोमोसोम (gene present on ‘X’ chromosome) पर उपस्थित होते हैं।

अतः इसके जीन मां से बेटों में और पिता से बेटियों (from mother to son and from father to daughter) में जाते हैं इस प्रकार से यह क्रिस क्रॉस इन्हेरिटेंस (criss cross inheritance) दिखाते हैं।

वर्णांधता के जीन की उत्पत्ति उत्परिवर्तन (mutation in gene of cones cells) के द्वारा हुई है।

क्यों इस रोग में लाल और हरे रंग के बीच में विभेद नहीं हो पाता (why in colour blindness patient can’t differentiate between red and green colour)?

रंगों को पहचानने के लिए हमारी आंखों की रेटिना में तीन तरह की कोन कोशिकाएं (Retinal Cone cells) मौजूद होती हैं इनके अंदर अलग-अलग प्रकार के प्रकाश को अवशोषित करने वाले वर्णक (colour pigments) मौजूद होते हैं।

जो प्रकाश में मौजूद विभिन्न रंगों की वेवलेंथ (wavelength) को अवशोषित करते हैं और हमें अलग-अलग रंगों का आभास कराते हैं।

इन वर्णक को बनाने वाले जीन में बदलाव होने की वजह से लाल और हरे रंग के बारे में सही-सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है।

कभी-कभी वर्णांधता की बीमारी आंखों को जाने वाली मस्तिष्क कोशिकाओं (nerve cells or neurons) या जिनको ऑप्टिक नर्व्स (optic neurons) कहते हैं में ख़राबी आने की वजह से पैदा होती है।

वर्णांधता के प्रकार(types of colour blindness)

रंगो को न पहचानने की क्षमता के आधार पर, वर्णांधता को भी अलग-अलग भागों में समझा जा सकता है

प्रोटानोपिया (Protanopia)

इस लाल रंग को पहचानने में दिक्कत आती है, ऐसे व्यक्ति में लाल रंग के जो भी शेड्स होते हैं उनको समझने में परेशानी होती है।

डयुटेरानोपिया (Deuteranopia)

इसमें हरे रंग को समझने में दिक्कत आती है इसके साथ ही दूसरे रंगों जैसे नारंगी हरे और भूरे रंगों में विभेद करने में परेशानी होती है।

ट्राइटानोपिया (Tritanopia)

यह बहुत ही दुर्लभ वर्णांधता की बीमारी है जिसमें केवल लाल और हरे वर्णक मौजूद होते हैं और नीले वर्णक पूरी तरह से अनुपस्थित होते हैं।

इसलिए नीला रंग, हरे, पीले रंग में और नारंगी रंग गुलाबी रंग जैसा दिखाई देता है, जबकि बैंगनी रंग गहरा लाल दिखाई देता है।

ट्रायक्रोमेसी (Trichromacy)

इसमें तीनो रंगो यानी लाल, हरे और नीले को पहचानने में दिक्कत आती है।

मोनोक्रोमेसी (Monochromacy)

इसमें काला, सफेद और धूसर रंग ही दिखाई देता है।

क्या वर्णांधता प्रभावी अनुवांशिक बीमारी है? क्यों वर्णांधता पुरुषों में महिलाओं के अपेक्षा अधिक दिखती है?(is colourblind dominant genetic disease & why colourblind ness is more frequently seen in males than females)?

नहीं, क्योंकि वर्णांधता एक अप्रभावी अनुवांशिक बीमारी है (colourblind is recessive genetic disease) इसके जीन एक्स क्रोमोसोम पर उपस्थित होते हैं।

हालांकि पुरुषों में यह प्रभावी ( dominant due to presence of single ‘X’ chromosome) है क्योंकि उनमें एक ही एक्स क्रोमोसोम उपस्थित होता है।

how colour blindness gene inherited

जिसकी वजह से अगर वह एक्स क्रोमोसोम (‘X’ chromosome) में वर्णांधता का जीन रखता है तो वह वर्णांधता रोगी (colourblind patient) हो जाएगा।

इसलिए पुरुषों का में एक ही एक्स क्रोमोसोम होने की वजह से यह बीमारी उनमें प्रभावी हो जाती है। इसी कारण से पुरुषों में वर्णांधता ज़्यादा आसानी से हो जाती है।

जबकि महिलाओं में दो एक्स क्रोमोसोम उपस्थित (two ‘X’ chromosomes) होते हैं। इसलिए जब तक महिलाओं में दोनों एक्स क्रोमोसोम में वर्णांधता के जीन मौजूद न हो तब तक यह बीमारी नहीं होगी।

केवल एक एक्स क्रोमोसोम (single ‘X’ chromosome) पर वर्णांधता जीन मौजूद होने की वजह से वह इस रोग की वाहक (carrier female) होंगी न कि वर्णांधता रोगी (colourblind patient) होंगी।

लेकिन यदि दोनों एक्स क्रोमोसोम पर वर्णांधता के जीन मौजूद हैं तभी वर्णांधता की मरीज़ होंगी जिसकी संभावना बहुत ही कम होती है।    

जैसा कि हमने हीमोफीलिया रोग में देखा था, उसी प्रकार से कलर ब्लाइंडनेस में भी पुरुष इस रोग से ज़्यादा ग्रसित होते हैं।

कलर ब्लाइंडनेस या वर्णांधता का प्रतिशत स्त्री और पुरुष में काफी हद तक बदल जाता है।

अगर पुरुषों की बात करें तो  यह लगभग 8% संभावना के साथ अधिकतम स्तर है, वही महिलाओं में इसकी संभावना काफी कम लगभग 0.5% होती है।

males are mostly colour blind

इस तरह हम देखते हैं कि महिलाओं में यह एक दुर्लभ बीमारी (rarest in females) है जबकि पुरुषों में यह ज़्यादा आसानी से हो सकती है।

क्या वर्णांधता का कोई इलाज है(is there any permanent cure of colour blindness)?

क्योंकि यह जेनेटिक बीमारी है इसलिए अभी तक इसका कोई परमानेंट इलाज नहीं खोजा गया है। 

हालांकि इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के लिए अब कुछ विशेष किस्म के लेंस आंखों के लिए बनाए गए हैं और कुछ कंप्यूटर और मोबाइल एप्स भी तैयार किए गए हैं।

इसके अलावा जीन थेरेपी (gene therapy) पर भी काम चल रहा है जिसमें सही जीन को लगाकर वर्णांधता को ठीक किया जा सके।

लेकिन यह अभी एकदम नई तकनीक है, हो सकता है भविष्य में यह और ज़्यादा अच्छी हो जाए और इस रोग का स्थाई इलाज संभव हो सके।

इसके साथ ही वंशावली चार्ट विश्लेषण या फैमिली ट्री विश्लेषण (Pedigree chart analysis for family tree analysis) और जेनेटिक काउंसलिंग भी ज़रूरी है, ताकि शादी से पहले ही यह देखा जा सके कि पूर्वजों में या माता-पिता में किसी के अंदर ऐसी बीमारी होने की या उनके संतानों में आने की संभावना तो नहीं है।

वर्णांधता की पहचान के लिए कौन सा टेस्ट किया जाता है(how to test Colour blindness)?

इस बीमारी का पता लगाने के लिए ईशिहारा टेस्ट (Ishihara Test) किया जाता है जिसे सबसे पहले शीनोबु ईशिहारा (Shinobu Ishihara-1917) ने विकसित किया था, जोकि टोक्यो विश्वविद्यालय (University of Tokyo) में प्रोफेसर थे।

इसके अलावा आज के समय में और भी बहुत सारे परीक्षण मौजूद हैं।

विश्व कलर ब्लाइंडनेस जागरूकता दिवस कब मनाते हैं (When World Colour blindness awareness day celebrated)?

हर साल विश्व कलर ब्लाइंडनेस जागरूकता दिवस 6 सितंबर (6th September) को मनाया जाता है यह इस रोग के खोजकर्ता जॉन डाल्टन (John Dalton) के जन्मदिवस के तौर पर मनाया जाता है।

क्योंकि इन्होंने सबसे पहले इस रोग पर वैज्ञानिक  तरीक़े से अध्ययन किया था और यह खुद भी इस रोग से पीड़ित थे। हालांकि इनका कार्य लाल-हरे कलर ब्लाइंडनेस पर ज़्यादा फोकस था।

वर्णांधता में सामाजिक दिक्कतें (colourblindness related problems)

ऐसे व्यक्ति हैं जिनमें किसी भी प्रकार की वर्णांधता है, उन्हें बहुत से विभाग में नौकरी (जैसे कि सेना में) से वंचित होना पड़ता है।

जैसे कि बहुत सारे देशों में हवाई जहाज़, ट्रेन और दूसरे विभाग में इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को नौकरी नहीं दी जाती है।

इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को ट्रैफिक सिग्नल पहचानने (Traffic signal) के अलावा और भी कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

अंत में (Conclusion):

इस प्रकार हम देखते हैं की इस बीमारी का अभी तक कोई सटीक और परमानेंट इलाज तो नहीं आ सका है लेकिन अगर हम समय रहते इस रोग से संबंधित जेनेटिक काउंसलिंग और पेडिग्री एनालिसिस कर ले तो इसके प्रभाव से बचा जा सकता है।

इसके साथ ही कलर ब्लाइंडनेस के संबंध में विशेष जागरूकता बहुत ज़रूरी है।

आपको यह आर्टिकल कैसा लगा उसके बारे में अपनी राय जरूर दें किसी भी तरह के सुझाव का स्वागत रहेगा।

अपना कीमती समय देने के लिए आपका बहुत

धन्यवाद!! Thanks!!

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