छठी बार जीवों के विलुप्त होने (Mass Extinction) के कगार पर हैं?

Share

पृथ्वी के लिए जैव-विविधता क्यों ज़रूरी है?

क्या हम सच में छठी बार बड़े पैमाने पर जीवों के विलुप्त होने (mass extinction) के कगार पर हैं?

यह बात सिर्फ़ मैं नहीं कह रहा हूँ; क्लास 12 की NCERT बायोलॉजी की किताब के आखिरी चैप्टर—”जैव-विविधता और संरक्षण” (Biodiversity and Conservation)—में बताया गया है कि जिस रफ़्तार से प्रजातियाँ (चाहे वे पौधे हों या जानवर) विलुप्त हो रही हैं, वह सामान्य से 100 से 1,000 गुना ज़्यादा तेज़ है। इसकी सीधी वजह इंसानी गतिविधियाँ हैं।
हमारी पृथ्वी पहले भी पाँच बार बड़े पैमाने पर जीवों के विलुप्त होने की घटनाएँ देख चुकी है, जिसमें कई प्रजातियाँ खत्म हो गईं; लेकिन इस बार स्थिति अलग है क्योंकि विलुप्त होने की रफ़्तार बहुत ज़्यादा है।
आइए देखें कि पृथ्वी पर कितनी बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं, उनकी वजह क्या थी, और हर घटना में कितनी प्रजातियाँ पूरी तरह खत्म हो गईं।

हम देखते हैं कि अभी भी ऐसे लोग हैं जो हमारे पर्यावरण के सामने आए संकट की गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं—एक ऐसा संकट जो हमें धीरे-धीरे तबाही की ओर धकेल रहा है, या जिसे जीवों के बड़े पैमाने पर विलुप्त होने की घटना कहा जा सकता है।
लेकिन इसके संकेत क्या हैं? आज के शो में हम इसी बारे में बात करेंगे। आइए यह भी जानें कि और क्या-क्या है।
इस बड़े पैमाने पर विलुप्त होने की घटना के संकेत क्या हैं?
अगर इंसानियत पृथ्वी से खत्म हो जाए, तो यह हमारे लिए तो बहुत बड़ी घटना होगी, लेकिन ग्रह के लंबे इतिहास में यह बस एक छोटी सी बात होगी।
शायद इतना कहना ही काफ़ी होगा कि ‘होमो सेपियंस’ (इंसान) नाम की प्रजाति कुछ समय के लिए पृथ्वी पर रही और फिर विलुप्त हो गई—ठीक वैसे ही जैसे डायनासोर हुए थे।
और अनगिनत दूसरे जीवों की तरह। पृथ्वी पर अब तक जितने भी जीव रहे हैं, उनमें से 99% से ज़्यादा पहले ही विलुप्त हो चुके हैं, और यह प्रक्रिया आज भी जारी है।
लेकिन समस्या यह है कि इंसानी गतिविधियों ने प्रजातियों के विलुप्त होने की रफ़्तार को उनकी प्राकृतिक गति से सैकड़ों गुना बढ़ा दिया है।

हमारा घर—”ब्लू प्लैनेट” (नीला ग्रह)—अनोखा है; जहाँ तक हम जानते हैं, ब्रह्मांड में कहीं और ऐसी स्थितियाँ नहीं हैं जो जीवन को सहारा देने के लिए उतनी ही अनुकूल हों जितनी यहाँ पृथ्वी पर हैं।

सबसे छोटे जीवों से लेकर विशाल और ताकतवर जीवों तक, और मिट्टी से अंकुरित होने वाले नन्हे बीज से लेकर लाखों वर्ग किलोमीटर में फैले जंगलों तक—यहाँ जीवन कई रूपों में मौजूद है—चाहे वे पौधे हों, जानवर हों, या ऐसे सूक्ष्मजीव हों जिन्हें हमने अभी-अभी समझना शुरू किया है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी पर लगभग 80 लाख प्रजातियाँ हैं (जिनमें से 17 से 18 लाख प्रजातियों की पहचान, खोज, नामकरण और वर्गीकरण किया गया है), फिर भी इनमें से तीन-चौथाई प्रजातियाँ इंसानों के लिए अज्ञात हैं।
पुरानी प्रजातियाँ खत्म हो जाती हैं और नई प्रजातियाँ सामने आती हैं; यह प्रकृति का एक बुनियादी नियम है। हालाँकि, पिछले 50 करोड़ वर्षों में, पृथ्वी पर जीवन ने पाँच बार बड़े पैमाने पर प्रजातियों के विलुप्त होने की घटनाओं (mass extinction events) का सामना किया है—ऐसे समय जब ग्रह की 75% से 95% प्रजातियाँ एक ही झटके में खत्म हो गईं।
वैज्ञानिक इसे “मास एक्सटिंक्शन” (mass extinction)—यानी प्रजातियों का बड़े पैमाने पर विनाश—कहते हैं।

जैव विविधता के 5 बड़े विलुप्ति-काल (Mass Extinctions) की समय-रेखा

1-ऐसी पहली घटना 44 करोड़ साल पहले हुई थी, जब ग्लेशियर बनने के कारण समुद्र का जलस्तर बहुत नीचे गिर गया, जिससे उस समय मौजूद 86% प्रजातियाँ खत्म हो गईं।
2-दूसरी बड़ी विलुप्ति की घटना लगभग 36 करोड़ साल पहले हुई थी; महासागरों में ऑक्सीजन की कमी और पर्यावरणीय बदलावों के कारण लगभग 75% समुद्री प्रजातियाँ खत्म हो गईं।
3-लेकिन सबसे विनाशकारी विलुप्ति की घटना लगभग 25 करोड़ साल पहले हुई थी, जब 95% से अधिक समुद्री जीवन और बड़ी संख्या में ज़मीन पर रहने वाली प्रजातियाँ खत्म हो गईं।
4-चौथी बड़ी विलुप्ति की घटना लगभग 21 करोड़ साल पहले ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण हुई थी, जिससे 80% प्रजातियाँ खत्म हो गईं।
5-पृथ्वी पर आखिरी बड़ी विलुप्ति की घटना लगभग 6.5 करोड़ साल पहले हुई थी, जब डायनासोर सहित 76% प्रजातियाँ खत्म हो गईं।

अब, कई वैज्ञानिकों का तर्क है कि पृथ्वी छठी बड़ी विलुप्ति की घटना से गुज़र रही है, जो प्राकृतिक आपदाओं के कारण नहीं, बल्कि इंसानों के कारण हो रही है।
ऊर्जा के लिए हमारी कभी न खत्म होने वाली भूख पृथ्वी पर जीवन को खतरे में डाल रही है; बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है। इससे पानी, ज़मीन और हवा में रहने वाली कई प्रजातियों के लिए ज़िंदा रहना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि उनके रहने की जगहें (हैबिटैट) खत्म हो रही हैं।

रिसर्च रिपोर्ट के हवाले

2019 में, 50 देशों के लगभग 145 विशेषज्ञों की एक विस्तृत रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि आने वाले दशकों में लगभग दस लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है।

WWF (वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर) की 2024 की ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट’ बताती है कि 1970 और 2020 के बीच 50 सालों में वन्यजीवों की आबादी में लगभग 73% की कमी आई है।
इस रिसर्च में उभयचरों (amphibians), पक्षियों, मछलियों, स्तनधारियों और सरीसृपों (reptiles) की 5,495 प्रजातियों की लगभग 35,000 आबादी पर नज़र रखी गई।
सबसे ज़्यादा गिरावट—लगभग 85%—मीठे पानी में रहने वाली प्रजातियों की आबादी में देखी गई।
इसके बाद ज़मीन पर रहने वाली प्रजातियों में 69% और समुद्री प्रजातियों की आबादी में 56% की गिरावट आई।
पर्यावरण में इंसानी दखल के बिना प्रजातियों के विलुप्त होने की जो प्राकृतिक दर होती है, उसकी तुलना में अभी प्रजातियां 100 से 1,000 गुना तेज़ी से खत्म हो रही हैं।
कुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो इस सदी के आखिर तक धरती की 50% प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।

हालांकि, वैज्ञानिकों का एक वर्ग मानता है कि धरती अभी तक छठे बड़े पैमाने पर विलुप्ति (mass extinction) के दौर में नहीं पहुंची है।
फिर भी, विलुप्ति का संकट तो निश्चित रूप से पैदा हो गया है, और भविष्य में यह बड़े पैमाने पर विलुप्ति का रूप ले सकता है।

निष्कर्ष

हर स्तर पर अपनी जैव-विविधता (biodiversity) की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हम सिर्फ़ यह कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि, “मैं क्या कर सकता हूँ? यह तो सरकारों और पूरी दुनिया का काम है।” हमें खुद पहल करनी होगी।

समाधान

मैं एक बहुत आसान समाधान बताता हूँ: बस एक पेड़ लगाएँ और उसके पूरी तरह से पनपने तक उसकी देखभाल करें; फिर दूसरा पेड़ लगाएँ, और जब तक आप ऐसा कर सकें, इस प्रक्रिया को दोहराते रहें।

click here to read in English

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *